सफेदपोश नेता की मांग से बिखरा सट्टा अंडरग्राउंड प्रथा से बदस्तूर जारी सट्टे का अवैध कारोबार
चंदे की मांग से मची सनसनी एक लाख की सफेदपोश नेता रखी थी मांग
आमला। शहर में सट्टा खवाड़ों के बीच इस बार जिस बात ने सनसनी फैला दी वह है एक सफेदपोश नेता द्वारा एक लाख रुपये के चंदे की मांग का खुलासे की चर्चा शहर के चौक चौराहों पर चल रही है विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार नेता ने शहर के प्रमुख तीन सट्टा खवाड़ों से मांग की थी कि वे उसे आर्थिक सहयोग दें। इस खुलासे के बाद व्यापारियों और आम लोगों में चिंता और आक्रोश दोनों बढ़ गए हैं। सट्टे के साथ नगण्य कानूनी छवि वाले नेताओं का जुड़ाव शहर की बदनामी का कारण बन रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या सत्ता और अवैध कारोबार के बीच गहरे संबंध शहर को अवैध गतिविधियों की ओर धकेल रहे हैं। नेताओं की इस तरह की दखलअंदाज़ी से पुलिस और प्रशासन की छवि भी सवालों के घेरे में आ गई है। अवैध गतिविधियों के आरोपों की तफ्तीश और पारदर्शिता की मांग अब तेज हो गई है। कई दुकानदार ने नाम न बताने की शर्त पर यह जानकारी दी है। मामला बढ़ने पर नागरिक मंच और समाजसेवी भी जांच की मांग उठा सकते हैं।
एजेंटों की अंडरग्राउंड चालें पट्टी काटने से फिर दुकान पर लौटकर धंधा
सट्टे के एजेंट अब खुलकर नहीं बल्कि अंडरग्राउंड तरीकों से अपना कारोबार चला रहे हैं और उसके नए तरीके सामने आ रहे हैं। कई एजेंट घरों से पट्टी काट कर, नकली व्यवहार कर, अथवा अस्थायी ठिकानों का प्रयोग कर पल्ला झाड़ लेते हैं और फिर उसी दिन वापस दुकान पर आकर सामान्य व्यापार की आड़ में सट्टा की पट्टी चलाते हैं। इससे ग्राहक और निगरानी दोनों को भ्रमित करने में सहजता होती है और पुलिस की पकड़ से बचने का रास्ता मिल जाता है। एजेंटों के बीच इन नए प्रयोगों से अवैध कारोबार का दायरा और जटिल हो गया है, जिससे ठोस सबूत जुटाना मुश्किल हो गया है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि कभी-कभी पट्टी काटने का बहाना गाँवों तक फैला दिया जाता है ताकि शहर में कोई शक न हो। इससे कलेक्शन और भुगतान का चक्र भी अधिक छिपा हुआ और व्यवस्थित तरीका अपनाने लगा है। कुछ एजेंटों ने अपना नेटवर्क गाँवों तक फैला रखा है ताकि निगरानी की दरकार कम रहे। इस तरह की रणनीतियों ने सट्टे के कारोबार को आधिकारिक नज़रों से और भी दूर कर दिया है। परिणामस्वरूप शहर में अवैध आर्थिक धारा की प्रवाहशीलता बनी हुई है और इससे कानून की चुनौतियाँ बढ़ गई हैं।
पुलिस पर सवाल और प्रशासन की भूमिका क्या बदलेगी हवा?
नए पुलिस कप्तान की तैनाती के बाद जनता को उम्मीद थी कि अवैध गतिविधियों पर शिकंजा कसा जाएगा, पर व्यवहारिक तौर पर कोई निर्णायक बदलाव नहीं दिखा। आधा सैकड़ा से ज्यादा एजेंट जिनके बारे में राजस्व और प्रशासनिक दायरों में शिकायतें आती रही हैं, वे अब अंडरग्राउंड होकर भी अपनी परिपाटी नहीं छोड़ रहे। नेताओं और व्यापारियों के बीच घनिष्ठता और दबाव के कारण कार्रवाई सतही रह जाने की बातें आम हैं। कुछ नागरिकों ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण की वजह से पकड़ कमजोर पड़ती है। दूसरी ओर, पुलिसकर्मियों ने कहा है कि सबूत जुटाना और विश्वसनीय गवाह खड़े करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। यदि प्रशासन ने समन्वित जांच, वित्तीय ट्रेस और त्वरित छापामारी का क्रम शुरू किया तो स्थिति बदली जा सकती है। फिलहाल शहर में कानून के शासन के प्रति अविश्वास और बेचैनी दोनों देखी जा रही हैं। नागरिक संगठनों और मीडिया से मांग है कि वे मामले की स्वतंत्र जाँच और रिपोर्टिंग कर इसे सार्वजनिक बनाए रखें।